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Khurshid Hayat
 
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* लफ़्ज़ों ने रात की तन्हाई में *
लफ़्ज़ों ने
रात की तन्हाई में
हौले से कहा
क्या मैं ने
तुम्हारी हथेली पे
लफ्ज़ लफ्ज़
इक नया सूरज नहीं रखा ?
जिंदगी रंग फ़लक पर
नई उम्मीदों के
सितारे नहीं टाँके ??
बहती हुयी हवाओं ने
हर पल संभाला नहीं तुम्हें ???
मेरे "साये '' ही "साये "
तुम्हारे मुहाफ़िज़ रहे .
सहमी हुयी हैं
क्यों तुम्हारी आँखें
मेरे जमाल से !!?
***
 
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