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Khurshid Hayat
 
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* वह एक मिटटी नर्म हथेलियों से *
वह
एक मिटटी
नर्म हथेलियों से
लिपटी रहा करती थी कभी I 
दीवार लीपते हुए 
कभी ड्योढ़ी को
नया बाँकपन देते हुए
हवाएं गुनगुनातीं
बूंदियाँ बरसतीं
बिजलियाँ चमकतीं I 
सोंधी सोंधी
खुशबूएं
हर आँगन में
फैल जाया करती थीं कभी ....
आज !
पथरीले रास्तों पर
चलती हुई
मिटटी बदन 
बेटियां
पूछती हैं
तुम्हारा पता .
-------
खुर्शीद हयात
 
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