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Kaifi Azmi
 
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* बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने म&# *
बस इक झिझक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में 
कि तेरा ज़िक्र भी आयेगा इस फ़साने में 

बरस पड़ी थी जो रुख़ से नक़ाब उठाने में 
वो चाँदनी है अभी तक मेरे ग़रीब-ख़ाने में 

इसी में इश्क़ की क़िस्मत बदल भी सकती थी 
जो वक़्त बीत गया मुझ को आज़माने में 

ये कह के टूट पड़ा शाख़-ए-गुल से आख़िरी फूल 
अब और देर है कितनी बहार आने में 
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