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Kaifi Azmi
 
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* कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतशार-सा है । *
कभी जमूद कभी सिर्फ़ इंतशार-सा है ।
जहाँ को अपनी तबाही का इंतज़ार-सा है ।

मनु की मछली, न कश्ती-ए-नूह और ये फ़जा
कि क़तरे-क़तरे में तूफ़ान बेक़रार-सा है ।

मैं किसको अपने गरेबाँ का चाक दिखलाऊँ
कि आज दामने-यज़्दाँ भी तार-तार-सा है ।

सजा-सँवार के जिसको हज़ार नाज़ किए
उसी पे ख़ालिके-कोनैन शर्मसार-सा है ।

तमाम जिस्म है बेदार, फ़िक्र ख़ाबीदा
दिमाग़ पिछले ज़माने की यादगार-सा है ।

सब अपने पाँव पे रख-रखके पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने दोश पे हर आदमी सवार-सा है ।

जिसे पुकारिए मिलता है इक खंडहर-से जवाब
जिसे भी देखिए माज़ी का इश्तहार-सा है ।

हुई तो कैसे बियाबाँ में आके शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मेरा मज़ार-सा है ।

कोई तो सूद चुकाए, कोई तो ज़िम्मा ले
उस इन्क़लाब का, जो आज तक उधार-सा है ।
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