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Khumar Barabankvi
 
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* अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं *
अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं 
मेरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं 

इलाही मेरे दोस्त हों ख़ैरियत से 
ये क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं 

बहुत ख़ुश हैं गुस्ताख़ियों पर हमारी 
बज़ाहिर जो बरहम नज़र आ रहे हैं 

ये कैसी हवा-ए-तरक्की चली है 
दीये तो दीये दिल बुझे जा रहे हैं 

बहिश्ते-तसव्वुर के जलवे हैं मैं हूँ 
जुदाई सलामत मज़े आ रहे हैं 

बहारों में भी मय से परहेज़ तौबा 
'ख़ुमार' आप काफ़िर हुए जा रहे हैं 
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