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Khurshid Hayat
 
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* ऐ री , जीवन लक्ष्य सखी री ! *
ऐ री , जीवन लक्ष्य सखी री !
हम सब की ज़मीन...
तुम कितनी हसीं लगती हो
हरी ओढ़नी लपेटे
ज़िंदगी की संभावनाओं को समेटे
सूरज के इर्द गिर्द घूमती रहती हो
रश्मि जब लिपटती है तुझ से
जीवन के नए गीत गाती हो
तुम्हारा  गर्म , नर्म और भीगा भीगा सा ये बदन  जीवन का संगीत !
ओ सुनहरी सभ्यताओं की राज़दान !
रंग जाती हो
जिंदगी के "पालना " को
गौरैयों , पक्षियों , जिंदगी रंग फूलों में !
चांदनी तुम से लिपटती है जब
संगमरमरी हो जाती हो तुम....
ऐ री सखी री ...
तुम हो तो राहें हैं
हमेशा कायम रहने वाली
कामयाबी की मंजिलें हैं...
 
कल कल करते ये झरने
पहाड़ों से लिपट कर
बहती ये नदियाँ
समुन्दर की बांहों में समां जाती हैं ..
ओ हम सब के कर्मों की गवाह !
कल जब फैसले का दिन आये
हमें शर्मिंदा मत कीजियो .....
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