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Khurshid Hayat
 
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* हे री मेरी दीवानी सखी *
हे री मेरी दीवानी सखी
तेरा ये जागना
हर लम्हा 
ये घुमते रहना
सूरज  के इर्द गिर्द
ये लम्हा ए इश्क है या फिर
फरमाँबरदार होने की ख़ूबसूरत अदा .
अपनी ये अदा  मेरे नाम कर दो
हे री मेरी दीवानी सखी !
सखी!
हर क़बीले की 
हर खानदान की
सहेली हम सब के वतन की
सहेली मिटटी बदन इंसान की  
खामोश ज़बान से
तुम हर लम्हा कहती हो
बंदगी ऐसी होती है
मुहब्बत ऐसी होती है.
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खुर्शीद हयात
 
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