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Khurshid Hayat
 
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* क्यों समझ नहीं पाते पापा मेरे *
क्यों समझ नहीं पाते पापा मेरे 
आशियाँ में तुम हो अब बे बाल ओ पर ; 

इन फिज़ाओं पर तुम्हारा हक नहीं 
जाते हो सेहन ए चमन में तुम किधर ; 

तेज़ होगी दिन ब दिन ये दोपहर 
मौज दरिया का न होगा अब गुज़र ; 

नीम के साए ये देते हैं सदा 
चाहिए आराम तो आओ इधर 

जिस्म का है खोल मानिंद ए क़फ़स 
लौट आओ और संभालो अपना घर

-------खुर्शीद हयात : हिनाई सायतों में लिखी गयी तहरीर ...
 
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