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Khwaja Hyder Ali Aatish
 
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* ये आरज़ू थी तुझे गुल के रूबरू करते *
ये आरज़ू थी तुझे गुल के रूबरू करते 
हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तगू करते 

पयाम बर न मयस्सर हुआ तो ख़ूब हुआ 
ज़बान-ए-ग़ैर से क्या शर की आरज़ू करते 

मेरी तरह से माह-ओ-महर भी हैं आवारा 
किसी हबीब को ये भी हैं जुस्तजू करते 

जो देखते तेरी ज़ंजीर-ए-ज़ुल्फ़ का आलम 
असीर होने के आज़ाद आरज़ू करते 

न पूछ आलम-ए-बरगश्ता तालि-ए-"आतिश" 
बरसती आग में जो बाराँ की आरज़ू करते 
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